स्वामी सत्यानन्द जी महाराज

पुraini Dham
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स्वामीसत्यानंद जी महाराज का जन्म वर्ष 1861 की चैत्र शुक्ला पूर्णमाशी को एक मोहयाल ब्राह्मण परिवार में रावलपिंड के एक गांव ‘जग्गू का मोर’ मे हुआ। आपको नाना के यहां लक्ष्मण और दादा के यहां गोविंद नाम से पुकारा जाता था। आपकी उम्र जब 17 वर्ष की हुई तो आप जैन यति बन गए और 13 वर्ष तक सेवा की। वर्ष 1891 में जैन मत को छोड़कर आर्य समाज मेें प्रवेश किया। आर्य समाज में 25 वर्ष तक वैदिक प्रचार करते रहे और दो ग्रंथ ‘ओंकार उपासना’ तथा ‘दयानंद प्रकाश’ लिखे जो कि माननीय है।

स्वामी जी वर्ष 1925 में डलहौजी के एकांत स्थान मे साधना में बैठ गए जब तक उन्हें परम प्राप्ति नहीं हुई , तब तक दिन रात तपस्या की। एक महीने के बाद प्रभु ने स्वयं गुरु बनकर आकाशवाणी की ओर से राम नाम झोली में डोल दिया तथा ‘रा और म, अक्षरमयी ‘राम, रूप तेजोमय दर्शन हुए। इसके साथ साथ प्रभु ने अनेक सिद्धि एवं शक्ति की अनमोल बख्शीश भी कर दी। इसके बाद स्वामी जी महाराज ने श्री भक्ति प्रकाश ग्रंथ की रचना की। स्वामी जी महाराज 13 नवंबर 1960 को ज्योति जोत समा गए। आज शारीरिक रूप में तो स्वामी जी महाराज नहीं है लेकिन आत्मिक रूप में सब भक्तों के अंग-संग हैं।

उनकी कृपा से राम नाम की ज्योति घर-घर में जग रही है। देश विदेश में प्रचार हो रहा है। उनके शिष्य पूज्य श्री प्रेम जी सेठी महाराज, परम पूज्य पिता जी श्री भक्त हंसराज जी महाराज और परम पूज्य मां शकुंतला देवी जी ने अपना एक-एक श्वास श्री रामशरणम के लिए लगा दिया और अपना जीवन ही गुरु चरणों में चढ़ा दिया। पूज्य पिता जी महाराज, सेठी जी महाराज और पूज्य मां शकुंतला देवी जी महाराज ज्योति जोत समा चुके हैं। स्वामी जी के जन्म दिवस पर सभी राम भक्तों को अपने घरों और श्री रामशरणम आश्रम में आकर दो-दो मोमबत्तियां या दीपक जरूर जलाने चाहिए।
 

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